प्यार तो बहोत करते थे, लेकिन अभ नफरत ज्यादा करते है..
प्यार तो जताया करते थे, कोई बताये ये नफरत कैसे जताते है?
लोग मतलबी होते है ये हम शायद भूल गए थे..
अंजानी राह पर, अनजाने शक्श के साथ हम ऐसेही चल दिए थे..
गलती तो हमारी थी की चमकती चीज़ को स्वर्ण समझ उसके तरफ कदम बढ़ाया,
जब उसको लपकने गए तब आंच से हाथ जल गया..
जख्म का तो दर्द नहीं पर स्वार्थ का है,
होगा भी क्यों नहीं दिल तो इंसान का ही है..
स्वार्थ ही तो सभ कुछ है भाई इस कलयुग में..
सारी दुनिया बईमान हुई तो रक्खा ही क्या है सरलता में?
खुद को यही समझाता हूँ पर दिल है की समझता नहीं..
इतना उलझा है अभ ये की उलझने सुलझाता ही नहीं..
शायद कोई ख्वाहिश रखना ही इस उलझन की जड़ है..
क्या बिना ख्वाहिशों के जीवन, संभव है?
अभ ये सोच रखना भी तो एक ख्वाहिश ही है..
तो क्यों कोसे खवशिशोंको जब स्वार्थ ही मंजिल है..
स्वार्थ के लिए बदलना, यही तो आज की रीत है ,
लोगों को मतलब के लिए इस्तेमाल करना, यही तो रिवायत है..
रिवायत बदलना चाहोगे तो खुद ही बदल जाओगे,
और फिर खुदको एक दिन कुछ ऐसी पंखतिया लिखते हुए पाओगे..
और अगर बदले नहीं तो फिरसे वही पंखतिया याद करोगे..
प्यार तो बहोत करते थे लेकिन अभ नफरत ज्यादा करते है..
प्यार तो जताया करते थे, कोई बताये ये नफरत कैसे जताते है ?
निखिल कुंभार
(dedicated to all my blog readers)
प्यार तो जताया करते थे, कोई बताये ये नफरत कैसे जताते है?
लोग मतलबी होते है ये हम शायद भूल गए थे..
अंजानी राह पर, अनजाने शक्श के साथ हम ऐसेही चल दिए थे..
गलती तो हमारी थी की चमकती चीज़ को स्वर्ण समझ उसके तरफ कदम बढ़ाया,
जब उसको लपकने गए तब आंच से हाथ जल गया..
जख्म का तो दर्द नहीं पर स्वार्थ का है,
होगा भी क्यों नहीं दिल तो इंसान का ही है..
स्वार्थ ही तो सभ कुछ है भाई इस कलयुग में..
सारी दुनिया बईमान हुई तो रक्खा ही क्या है सरलता में?
खुद को यही समझाता हूँ पर दिल है की समझता नहीं..
इतना उलझा है अभ ये की उलझने सुलझाता ही नहीं..
शायद कोई ख्वाहिश रखना ही इस उलझन की जड़ है..
क्या बिना ख्वाहिशों के जीवन, संभव है?
अभ ये सोच रखना भी तो एक ख्वाहिश ही है..
तो क्यों कोसे खवशिशोंको जब स्वार्थ ही मंजिल है..
स्वार्थ के लिए बदलना, यही तो आज की रीत है ,
लोगों को मतलब के लिए इस्तेमाल करना, यही तो रिवायत है..
रिवायत बदलना चाहोगे तो खुद ही बदल जाओगे,
और फिर खुदको एक दिन कुछ ऐसी पंखतिया लिखते हुए पाओगे..
और अगर बदले नहीं तो फिरसे वही पंखतिया याद करोगे..
प्यार तो बहोत करते थे लेकिन अभ नफरत ज्यादा करते है..
प्यार तो जताया करते थे, कोई बताये ये नफरत कैसे जताते है ?
निखिल कुंभार
(dedicated to all my blog readers)